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विश्व का सबसे महंगा आलू कहाँ उगाया जाता है ?

विश्व का सबसे महंगा आलू कहाँ उगाया जाता है ?

आज हम आपको बताऐंगे आलू की बेहतरीन किस्म के बारे में। विश्व का सबसे महंगा आलू फ्रांस का ले बोनोटे अपने अलहदा स्वाद की वजह से विश्व के सबसे महंगे आलू के तौर पर जाना जाता है। यह 50,000 से लेकर 90,000 रुपये प्रति किलोग्राम के हिसाब से बिकता है। आलू को सब्जियों का राजा कहा जाता है। क्योंकि, यह स्वाद में अव्वल स्थान पर आता है। आलू हम सबकी जिंदगी में विशेष स्थान रखता है। बतादें, कि कभी सब्जी तो कभी स्नैक्स के तौर पर इसका भर-भरकर उपयोग होता है।  सामान्यतः आलू का पूरी साल उपभोग किया जाता है। क्योंकि, इसकी कीमत कम होती है। साथ ही, हर किसी व्यंजन के साथ यह घुलमिल सकता है। फिलहाल, फुटकर में इसकी कीमत 10 से 15 रुपये प्रति किलो है। साथ ही, वर्ष भर यह अधिक से अधिक 20 से 50 रुपये के मध्य ही बिकता है। परंतु, क्या आपको जानकारी है, कि आलू की एक ऐसी भी किस्म है, जो सोने-चांदी की कीमत पर आती है। 

ले बोनोटे आलू की पैदावार किस देश में की जाती है

हम जिस आलू की बात कर रहे हैं, उस किस्म का नाम
ले बोनोटे Le Bonnotte है। यह किस्म केवल फ्रांस के अंदर ही उगाया जाता है। इस एक किलो आलू की कीमत इतनी अधिक है, कि किसी भी मध्यमवर्गीय परिवार के घर का वर्षभर का राशन जाए। यह 50,000 रुपये से लेकर 90,000 रुपये प्रति किलोग्राम की कीमत पर बिक्रय किया जाता है। अब इसमें चकित करने वाली बात यह है, कि इतना महंगा होने के बावजूद ले बोनोटे की खूब खरीदारी होती रहती है। इसकी वजह है, इसकी कम पैदावार। वर्षभर में इसका उत्पादन मई एवं जून के मध्य ही होता है। बेशक इसकी कीमत सातवें आसमान पर है। परंतु, तब भी लोग इसको खरीदकर खाने के लिए सदैव तैयार रहते हैं। 

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आलू की पैदावार कितनी होती है

आलू की इस किस्म के आलू के स्वाद को जो चीज सबसे हटकर बनाती है। वह है, इसकी विशेष प्रकार की खेती, जो कि केवल 50 वर्ग मीटर की रेतीली जमीन पर की जाती है। इसको उगाने के लिए खाद के तौर पर समुद्री शैवाल का उपयोग किया जाता है। पारंपरिक तौर पर अटलांटिक महासागर के लॉयर क्षेत्र के तट के फ्रांसीसी द्वीप नोइमोर्टियर पर इसका उत्पादन होता है। खेती के उपरांत आलू का चयन करने के लिए लगभग 2500 लोग सात दिन तक लगे रहते हैं।10,000 टन आलू की फसल में से केवल 100 टन ही ला बोनेटे उत्पादित होते हैं।

इस किस्म का आलू कैसा होता है ?

यदि हम ला बोनेटे के स्वाद पर नजर डालें तो इसमें नींबू के साथ नमक एवं अखरोट का भी स्वाद होता है, जो और किसी आलू के अंदर नहीं पाया जाता है। यह काफी मुलायम एवं नाज़ुक होते हैं। ऐसा कहा जाता है, कि इसको सामान्य तौर पर उबालकर ही निर्मित किया जाता है। इसको मक्खन और समुद्री नमक के साथ परोसा जाता है। यह आकार में काफी छोटे होते हैं। साथ ही, गोल्फ की गेंद के आकार से बड़े नहीं होते। वहीं, अगर इनके गूदे की बात करें, तो मलाईदार सफेद होता है। इस आलू की कीमत इसकी उपलब्धता के अनुरूप प्रति वर्ष होती है। परंतु, आज तक यह 50,000 से 90,000 रुपये प्रति किलो के बीच ही बिक्रय किया गया है।
Sweet Potato Farming: शकरकंद की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

Sweet Potato Farming: शकरकंद की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी

शकरकंद की फसल को कंदीय वर्ग में स्थान दिया गया है। भारत में शकरकंद की खेती अपना प्रमुख स्थान रखती है। भारत में शकरकंद की खेत का क्षेत्रफल प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। किसान आधुनिक ढंग से शकरकंद की खेती कर के अच्छा उत्पादन कर बेहतरीन आमदनी कर रहे हैं। शकरकंद की खेती व्यापारिक दृष्टिकोण से भी बेहद फायदेमंद है। यदि आप शकरकंद की खेती करना चाहते हैं एवं शकरकंद की खेती के आधुनिक तरीके जानना चाहते हैं। तो यह आर्टिकल आपके लिए काफी मददगार साबित होगा। क्योंकि शकरकंद की खेती कब और कैसे की जाती है, इसके लिए उपयुक्त जलवायु, मिट्टी, खाद व उर्वरक क्या हैं। शकरकंद की खेती के लिए कितना पीएच मान होना चाहिए और शकरकंद की रोपाई कैसे करें आदि की जानकारी इस लेख में मिलेगी।

शकरकंद की फसल के लिए भूमि, जलवायु एवं उपयुक्त समय

शकरकंद की खेती से बेहतरीन पैदावार लेने के लिए समुचित जल निकासी वाली और कार्बनिक तत्वों से युक्त दोमट अथवा चिकनी दोमट भूमि सबसे अच्छी मानी गई है। शकरकंद की फसल का बेहतरीन उत्पादन लेने के लिए मिट्टी का पी. एच. 5.8 से 6.7 के मध्य होना चाहिए। शकरकंद की खेती के लिए शीतोष्ण और समशीतोष्ण जलवायु अनुकूल मानी जाती है। शकरकंद की खेती के लिए सर्वोत्तम तापमान 21 से 27 डिग्री के मध्य होना चाहिए। शकरकंद के लिए 75 से 150 सेंटीमीटर वर्षा अनुकूल मानी जाती है। यह भी पढ़ें: इस फसल की बढ़ती माँग से किसानों को होगा अच्छा मुनाफा शकरकंद की खेती मुख्यतः वर्षा ऋतु में जून से अगस्त में की जाती है। रबी के मौसम में अक्टूबर से जनवरी में सिंचाई के साथ की जाती है। उत्तर भारत में शकरकन्द की खेती रबी, खरीफ व जायद तीनों मौसम में की जाती है। खरीफ ऋतु में इसकी खेती सर्वाधिक की जाती है। खरीफ सीजन में 15 जुलाई से 30 अगस्त तक शकरकंद की लताओं को लगा देना चाहिए। सिंचाई की सुविधा सहित रबी (अक्टूबर से जनवरी) के मौसम में भी शकरकंद की खेती की जाती है। जायद ऋतुओं में, इसकी लताओं को लगाने का वक्त फरवरी से मई तक का होता है। इस मौसम में खेती का प्रमुख उद्देश्य लताओं को जीवित रखना होता है। जिससे कि खरीफ की खेती में उनका इस्तेमाल हो सके। लताओं के अतिरिक्त शकरकन्द के कन्द को लगाकर भी सुनहरी शकरकन्द की खेती की जा सकती है।

शकरकंद की उन्नत किस्में कौन-कौन सी होती हैं

गौरी- शकरकंद की इस किस्म को साल 1998 में इजात किया गया था। गौरी किस्म को तैयार होने में लगभग 110 से 120 दिन का समय लग जाता है। शकरकंद की इस किस्म के कंद का रंग बैंगनी लाल होता है। गौरी किस्म की शकरकंद से औसतन उत्पादन तकरीबन 20 टन तक हो जाती है। इस किस्म को खरीफ एवं रवी के मौसम में उत्पादित किया जाता है। श्री कनका- शकरकंद की श्री कनका किस्म को साल 2004 में विकसित किया गया था। इस किस्म के कन्द का छिलका दूधिया रंग का होता है। इसको काटने पर पीले रंग का गूदा नजर आता है। यह 100 से 110 दिन के समयांतराल में पककर तैयार होने वाली किस्म है। इस किस्म का उत्पादन 20 से 25 टन प्रति हेक्टेयर है। एस टी-13 - शकरकंद की इस किस्म का गूदा बैगनी काले रंग का होता है। जानकारी के लिए बतादें, कि कंद को काटने पर गूदा बिल्कुल चुकंदर जैसे रंग का नजर आता है। इस किस्म के अंदर बीटा केरोटिन की मात्रा जीरो होती है। लेकिन, एंथोसायनिन (90 मिली ग्राम प्रति 100 ग्राम) वर्णक की वजह से इसका रंग बैंगनी-काला होता है। साथ ही, मिठास भी काफी कम होती हैं। लेकिन, एंटीऑक्सीडेन्ट एवं आयु बढ़ाने के लिए अच्छी साबित होती है। यह 110 दिन की समयावधि में पककर तैयार हो जाती है। साथ ही, इसका उत्पादन 14 से 15 टन प्रति हैक्टर होता है। यह भी पढ़ें: जिमीकंद की खेती से जीवन में आनंद ही आनंद एस टी- 14 - शकरकंद की यह किस्म साल 2011 में इजात की गई थी। शकरकंद की इस किस्म के कंद का रंग थोड़ा पीला वहीं गूदे का रंग हरा पीला होता है। इस किस्म के अंदर उच्च मात्रा में वीटा केरोटिन (20 मिली ग्राम प्रति 30 ग्राम) विघमान रहता है। इस किस्म को तैयार होने में 110 दिन का वक्त लगता है। यदि इसकी उपज की बात की जाए तो वह 15 से 71 टन प्रति हेक्टेयर होती है। आज तक के परीक्षण में इस किस्म को सबसे अच्छा पाया गया है। सिपस्वा 2- शकरकंद की इस किस्म का उत्पादन अम्लीय मृदा में भी किया जा सकता है। इनमें केरोटिन की प्रचूर मात्रा होती है। शकरकंद की यह किस्म 110 दिन की समयावधि में पककर तैयार हो जाती है। इसकी उपज 20 से 24 टन प्रति हेक्टेयर है। इन किस्मों अतिरिक्त शकरकंद की और भी कई सारी किस्में जैसे कि - पूसा सफेद, पूसा रेड, पूसा सुहावनी, एच- 268, एस- 30, वर्षा और कोनकन, अशवनी, राजेन्द्र शकरकंद- 35, 43 और 51, करन, भुवन संकर, सीओ- 1, 2 और 3, और जवाहर शकरकंद- 145 और संकर किस्मों में एच- 41 और 42 आदि हैं। किसान भाई अपने क्षेत्र के अनुरूप किस्म का चयन करें।

शकरकंद की फसल में खरपतवारों की रोकथाम

शकरकंद की फसल में खरपतवार की दिक्कत ज्यादा नहीं होती है। वैसे खरपतवारों की समस्याएं आरंभिक दौर में ही आती हैं, जब लताएं पूरे खेत में फैली हुई नहीं रहती। यदि शकरकंद की लताओं का फैलाव पूरे खेत में हो जाता हैं, तो खरपतवार का जमाव नहीं हो पाता है। यदि खेत में कुछ खरपतवार उगते हैं, तो मिट्टी चढ़ाते वक्त उखाड़ फेंकने चाहिऐं।

शकरकंद की खेती के लिए खाद एवं उर्वरक

शकरकंद की खेती में कार्बनिक खाद् समुचित मात्रा में डालें, जिससे मृदा की उत्पादकता बेहतर व स्थिर बनी रहती है। केन्द्रीय कंद अनुसंधान संस्थान द्वारा संस्तुति की गई रिपोर्ट के अनुसार 5 से 8 टन सड़ी हुई गोबर की खाद खेत की पहली जुताई के दौरान ही भूमि में मिला देनी चाहिए। रासायनिक उर्वरकों में 50 किलोग्राम नाइट्रोजन और 25 किलोग्राम फॉस्फोरस तथा 50 किलोग्राम पोटाश की जरूरत प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करनी चाहिए। नाइट्रोजन की आधी मात्रा फॉस्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा शुरू में लता लगाने के दौरान ही जड़ों में देनी चाहिए। शेष नाइट्रोजन को दो भागों में बांटकर एक हिस्सा 15 दिन में दूसरा हिस्सा 45 दिन टाप ड्रेसिंग के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। जानकारी के लिए बतादें, कि अत्यधिक अम्लीय जमीन में 500 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से चूने का इस्तेमाल कंद विकास के लिए बेहतर रहता है। इनके अतिरिक्त मैगनीशियम सल्फेट, जिंकसल्फेट और बोरॉन 25:15:10 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से इस्तेमाल करने पर कन्द फटने की दिक्कत नहीं आती हैं। वहीं समान आकार के कन्द लगते हैं।
आलू का समुचित मूल्य ना मिलने पर लागत निकाल पाना भी हुआ मुश्किल

आलू का समुचित मूल्य ना मिलने पर लागत निकाल पाना भी हुआ मुश्किल

आलू की कीमत बेहद कम होने से सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने राज्य सरकार पर सीधा निशाना साधा है। उन्होंने एक ट्वीट के जरिए से कहा है, कि "सरकार का 650 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आलू खरीदने का फरमान नाकाफी है"। बेहतरीन पैदावार होने की वजह से इस बार उत्तर प्रदेश के साथ-साथ विभिन्न राज्यों में आलू के भाव में काफी गिरावट देखने को मिली है। इससे किसानों को लाभ तो दूर की बात है, फसल पर किया गया खर्च निकालना भी असंभव सा हो गया है। साथ ही, बहुत सारे किसान भाई कीमतों में आई गिरावट की वजह से आलू कोल्ड स्टोर में रखना सही समझ रहे हैं। भाव में बढ़ोतरी होने पर वह आलू बेचेंगे। ऐसी स्थिति में कोल्ड स्टोर के अंदर भी जगह का अभाव हो गया है। फिलहाल, किसान आलू की कीमत को निर्धारित करने के लिए सरकार से मांग की जा रही है। साथ ही, आलू का निर्यात शुरू करने के लिए भी स्वीकृति देने की गुहार की जा रही है।

आलू की लागत तक नहीं निकाल पा रहे किसान

मीडिया खबरों के मुताबिक, पश्चिम बंगाल और बिहार में आलू की मांग में गिरावट होने की वजह से भी उत्तर प्रदेश में आलू के भाव में कमी देखने को मिली है। साथ ही, निर्यात ना होने की वजह से राज्य के
कोल्ड स्टोर के अंदर आलू को रखने के लिए समुचित जगह का भी अभाव हो गया है। इन परिस्थितियों में किसान भाई सरकार से आलू का न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने की मांग कर रहे हैं। किसानों ने बताया है, कि आलू का भाव कम होने की वजह से फसल पर किया गया खर्च निकालना भी कठिन सा हो रहा है। मुख्य रूप से कर्ज लेकर कृषि करने वाले किसान काफी घाटा सहकर आलू बेच रहे हैं। क्योंकि उनके पास कोल्ड स्टोर का किराया तक वहन करने की आर्थिक स्थिति नहीं है।

बाजार में फिलहाल आलू का क्या भाव है

हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से आलू का भाव निर्धारित कर दिया गया है। सरकार द्वारा ऐलान किया गया है, कि फिलहाल राज्य में 650 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से आलू की खरीद की जाएगी। परंतु, इसके उपरांत भी किसानों के चेहरे मायूस दिखाई दे रहे हैं। किसानों ने बताया है, कि प्रति क्विंटल आलू पर किया गया खर्च 800 रुपये के करीब है। अब इस परिस्थिति में हम आलू का विक्रय 650 रुपये क्विंटल किस तरह कर सकते हैं। बतादें, कि उत्तर प्रदेश की मंडियों में फिलहाल आलू का भाव 400 रुपये से 500 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से चल रहा है, जो किसान भाइयों के सिर दर्द की वजह बना हुआ है।

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सरकार का 650 रुपये प्रति क्विंटल की दर से आलू खरीदने का फरमान नाकाफी है : शिवपाल यादव

साथ ही, 650 रुपये प्रति क्विंटल आलू का भाव निर्धारित करने पर सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने राज्य सरकार पर निशाना साधा है। उन्होंने ट्वीट के माध्यम से कहा है, कि "सरकार का 650 रुपये प्रति क्विंटल के मूल्य से आलू खरीदने का फरमान नाकाफी है। उन्होंने कहा कि 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से बीज खरीदने वाले किसानों के लिए यह समर्थन मूल्य मजाक है। ऐसे में सरकार को न्यूनतम 1500 रुपए प्रति पैकेट की दर से आलू की खरीद करनी चाहिए।"

आलू का समुचित भाव ना मिलने पर निराश किसान ने सड़क पर फेंके आलू

बतादें कि इस वर्ष बिहार और पश्चिम बंगाल में भी आलू का बेहतरीन उत्पादन हुआ है। ऐसी स्थिति में ये दोनों राज्य उत्तर प्रदेश से आलू का आयात नहीं कर रहे हैं। आपको यह भी बतादें कि स्वयं बिहार के किसान भी आलू की कीमतों में आई गिरावट के चलते आलू सड़कों पर ही फेंक रहे हैं। शुक्रवार के दिन बिहार के बेगूसराय में एक हताश किसान ने आलू की समुचित कीमत न मिलने की वजह से 25 क्विंटल आलू को सड़क पर ही फेंक दिया था।
बिहार के वैज्ञानिकों ने विकसित की आलू की नई किस्म

बिहार के वैज्ञानिकों ने विकसित की आलू की नई किस्म

बिहार के लखीसराय में कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिकों ने आलू की एक नई किस्म विकसित की है। आलू की इस किस्म को "पिंक पोटैटो" नाम दिया गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि आलू की इस किस्म में अन्य किस्मों की अपेक्षा रोग प्रतिरोधक क्षमता ज्यादा है। साथ ही आलू की इस किस्म में बरसात के साथ शीतलहर का भी कोई खास असर नहीं पड़ेगा। फिलहाल इसकी खेती शुरू कर दी गई है। वैज्ञानिकों को इस किस्म में अन्य किस्मों से ज्यादा उपज मिलने की उम्मीद है।

आलू की खेती के लिए ऐसे करें खेत का चयन

ऐसी जमीन जहां पानी का जमाव न होता हो, वहां
आलू की खेती आसानी से की जा सकती है। इसके लिए दोमट मिट्टी सबसे ज्यादा उपयुक्त मानी जाती है। साथ ही ऐसी मिट्टी जिसका पीएच मान 5.5 से 5.7 के बीच हो, उसमें भी आलू की खेती बेहद आसानी से की जा सकती है।

खेती की तैयारी

आलू लगाने के लिए सबसे पहले खेत की तीन से चार बार अच्छे से जुताई कर दें, उसके बाद खेत में पाटा अवश्य चलाएं ताकि खेत की मिट्टी भुरभुरी बनी रहे। इससे आलू के कंदों का विकास तेजी से होता है।

आलू कि बुवाई का समय

आलू मुख्यतः साल में दो बार उगाया जाता है। पहली बार इसकी बुवाई जुलाई माह में की जाती है, इसके बाद आलू को अक्टूबर माह में भी बोया जा सकता है। बुवाई करते समय किसान भाइयों को ध्यान रखना चाहिए कि बीज की गोलाई 2.5 से 4 सेंटीमीटर तक होना चाहिए। साथ ही वजन 25 से 40 ग्राम होना चाहिए। बुवाई करने के पहले किसान भाई बीजों को अंकुरित करने के लिए अंधरे में फैला दें। इससे बीजों में अंकुरण जल्द होने लगता है। इसके बाद स्वस्थ्य और अच्छे कंद ही बुवाई के लिए चुनना चाहिए। ये भी पढ़े: हवा में आलू उगाने की ऐरोपोनिक्स विधि की सफलता के लिए सरकार ने कमर कसी, जल्द ही शुरू होगी कई योजनाएं आलू की बुवाई कतार में करनी चाहिए। इस दौरान कतार से कतार की दूरी 60 सेंटीमीटर होनी चाहिए जबकि पौधे से पौधे की दूरी 20 सेंटीमीटर होनी चाहिए।

आलू की फसल में सिंचाई

आलू की खेती में सिंचाई की जरूरत ज्यादा नहीं होती। ऐसे में पहली सिंचाई फसल लगने के 15 से 20 दिनों के बाद करनी चाहिए। इसके बाद 20 दिनों के अंतराल में थोड़ी-थोड़ी सिंचाई करते रहें। सिंचाई करते वक्त ध्यान रखें कि फसल पानी में डूबे नहीं।

आलू की खुदाई

आलू की फसल 90 से लेकर 110 दिनों के भीतर तैयार हो जाती है। फसल की खुदाई के 15 दिन पहले सिंचाई पूरी तरह से बंद कर देनी चाहिए। खुदाई से 10 दिन पहले ही आलू की पतियों को काट दें। ऐसा करने से आलू की त्वचा मजबूत हो जाती है। खुदाई करने के बाद आलू को कम से कम 3 दिन तक किसी छायादार जगह पर खुले में रखें। इससे आलू में लगी मिट्टी स्वतः हट जाएगी।
इस आलू की कीमत सोने से भी महंगी, जानिए इसकी कीमत

इस आलू की कीमत सोने से भी महंगी, जानिए इसकी कीमत

आज हम आपको इस लेख में ले बोनोटे आलू के बारे में जानकारी देने वाले हैं। वहीं, अगर इसकी उत्पत्ति की बात की जाए तो नोइरमौटियर द्वीप पर हुई है। विगत 200 साल से फ्रांस में इसकी खेती हो रही है। इसका नाम एक स्थानी किसान बेनोइट बोनोटे के नाम पर रखा गया है। बतादें कि ऐसा कहा जाता है, कि किसान बेनोइट बोनोटे ने सर्वप्रथम इसकी खेती चालू की थी। आलू की सब्जी का सेवन करना हर किसी को पसंद है। इसकी खेती तकरीबन पूरे भारत में की जाती है। यह एक ऐसा खाद्य पदार्थ है, जो कि पूरे वर्ष बाजार में असानी से मिल जाता है। इसकी कीमत सदैव 20 से 30 रुपये किलो ही रहती है। परंतु, कभी- कभी भारत में आलू 50-60 रुपये किलो भी हो जाता है। इससे महंगाई बढ़ जाती है। सरकार के ऊपर दवाब अधिक बढ़ जाता है। साथ ही, लोगों के किचन का बजट भी खराब हो जाता है। क्या आपको जानकारी है कि विश्व में आलू की एक ऐसी भी प्रजाति है, जिसकी कीमत काफी ज्यादा होती है। इस किस्म के एक किलो आलू खरीदने के लिए आपको हजारों रुपये का खर्चा करना पड़ेगा।

केवल फ्रांस में ही ले बोनोटे का उत्पादन होता है

विशेष बात यह है, कि आलू की इस किस्म का नाम ले बोनोटे है। इसकी खेती केवल फ्रांस में होती है। ऐसा कहा जाता है, कि इसकी कीमत एक तोले सोने से भी ज्यादा होती है। ऐसी स्थिति में आम भारतीय परिवार इस एक किलो आलू की कीमत में कई माह का राशन खरीद सकता है। आम तौर पर विश्व के धनवान लोग ही इस आलू का सेवन करते हैं। क्योंकि गरीब व्यक्ति एक किलो आलू खरीदने की जगह एक तोला सोना खरीद लेगा, जो कि बाद में बेहतरीन रिटर्न देगा। ये भी पढ़े: Potato farming: आलू की खेती से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी ले बोनोटे आलू इस वजह से इतना महंगा है, क्योंकि इसकी खेती फ्रांस के सीमित इलाकों में ही की जाती है। एक किलो ले बोनोटे की कीमत 50,000 से 90,000 रुपये के मध्य होती है। मतलब कि इतने रुपये में आप भारत में बहुत टन आलू खरीद सकते हैं। ऐसे ले बोनोटे आलू खाने में काफी स्वादिष्ट होता है। इसकी खेती केवल अटलांटिक महासागर में मौजूद फ्रांसीसी द्वीप नोइर्मौटियर पर ही होती है। बतादें, कि ले बोनोटे आलू को हाथ से भी काटा जाता है।

ले बोनोटे का सेवन मक्खन एवं नमक के साथ किया जाता है

इसकी काफी कम पैदावार होती है और यह सिर्फ मई व जून महीने के दौरान ही बाजार में मिलता है। एक किलो ले बोनोटे आलू की बिक्री अब तक सर्वाधिक 90048 रुपये में हुई है। यही कारण है, कि यह ट्रफल्स अथवा कैवियार जैसे बहुत से खाद्य उत्पादों की तुलना में ज्यादा महंगा है। ऐसा कहा जाता है, कि अनूठा स्वाद ले बोनोटे आलू को और ज्यादा महंगा बनाता है। बतादें, कि सामान्य आलू की भांति इसकी सब्जी नहीं बनाई जाती है। ले बोनोटे आलू को पहले पानी में उबाला जाता है। इसके उपरांत मक्खन और नमक के साथ मिलाकर सेवन किया जाता है। ये भी पढ़े: सीड प्लॉट तकनीक से गुणवत्तापूर्ण आलू बीज एवं बेहतरीन उत्पादन हांसिल करें

ले बोनोटे की पारंपरिक विधि से खेती की जाती है

ले बोनोटे आलू की पारंपरिक तरीकों के माध्यम से ही खेती की जाती है। किसान भाई इसकी रोपाई अपने हाथों से ही किया करते हैं। मतलब कि इसकी खेती में मशीन का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। यह आलू सामान्य आलू की अपेक्षा आकार में काफी छोटा होता है। इसका छिलका भी काफी पतला होता है। साथ ही, काफी मुलायम भी होता है। अब ऐसे में आप इसे आसानी से हाथों से भी काट सकते हैं।
आलू की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

आलू की खेती से संबंधित विस्तृत जानकारी

आलू की फसल को सब्जियों का राजा माना है। आलू तकरीबन हर सब्जी का आधार माना जाता है। इस वजह से आलू को दुनिया में चौथी सबसे महत्वपूर्ण सब्जी माना जाता है। गेंहू, मक्का और धान के उपरांत आलू की ही सबसे ज्यादा खेती होती है। आलू का काफी बड़े पैमाने पर उत्पादन भी होता है। भारत के आलू उत्पादक किसानों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती ये हैं, कि आलू के उत्पादन काल में जितनी लागत आती है उसकी तुलना में उन्हें मुनाफा नहीं मिल पाता है। इस समस्या से निपटने का उपाय उत्पादन की मात्रा को बढ़ाकर लागत को कम करना है। इसके लिए किसान भाइयों को ज्यादा उत्पादन देने वाली किस्मों का चयन करना चाहिए। आज हम आपको इस लेख के माध्यम से आलू की उन किस्मों के विषय में जानकारी देंगे। जो किस्में कम लागत में ज्यादा उत्पादन देती हैं। आलू उत्पादक किसानों के लिए यह लेख काफी फायदेमंद साबित होगा।

आलू की खेती के लिए उपयुक्त समयावधि

आपकी जानकारी के लिए बतादें कि आलू की अगेती बुआई का समय 15-25 सितंबर का होता है। वहीं, आलू की बुवाई का उचित समय 15-25 अक्टूबर तक का माना गया है। इसकी पछेती बुआई का समय 15 नवंबर से 25 दिसंबर के बीच का रहता हैं।

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आलू की प्रमुख उन्नत किस्में इस प्रकार हैं

आलू की अगेती किस्मों के अंतर्गत कुफरी अशोका, कुफरी जवाहर, कुफरी अलंकार, कुफरी पुखराज, कुफरी चंद्रमुखी इत्यादि हैं। साथ ही, आलू की मध्यम समय वाली प्रजातियों में कुफरी सतलुज, कुफरी सदाबहार, कुफरी बहार और कुफरी लालिमा आदि हैं। इसके अतिरिक्त कुफरी सिंधुरी कुफरी फ्ऱाईसोना और कुफरी बादशाह इसकी देर से पकने वाली प्रजातियां हैं।

कम समयावधि में अधिक उपज देने वाली कुफरी किस्में इस प्रकार हैं

आलू की कई किस्म होती है और इनका औसत उत्पादन 152 क्विंटल प्रति हेक्टेयर माना जाता है। परंतु, कुफरी किस्म का उत्पादन इससे भी काफी अधिक होता है। ये कुफरी किस्में 70 से 135 दिन के समयांतराल पर तैयार हो जाती हैं। इन कुफरी किस्मों से 152 से 400 क्विंटल तक का उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। आलू की ये कुफरी किस्में कुछ इस तरह से हैं।

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कुफरी चंद्र मुखी

यह किस्म 80 से 90 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

कुफरी नवताल जी 2524

आलू की यह किस्म फसल को 75 से 85 दिनों में तैयार कर देती है, जिससे प्रति हेक्टेयर 200 से 250 क्विंटल पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

कुफरी ज्योति

आलू की इस किस्म से फसल 80 से 150 दिनों में पक कर तैयार हो जाती है। इस किस्म से 150 से 250 क्विंटल प्रति हैक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

कुफरी लालिमा

आलू की इस किस्म से फसल मात्र 90 से 100 दिन में ही तैयार हो जाती है। यह किस्म अगेती झुलसा के लिए मध्यम अवरोधी भी है।

कुफरी शीलमान

आलू की खेती की यह किस्म 100 से 130 दिनों में पककर तैयार होती है। इससे 250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।

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कुफरी स्वर्ण

आलू की यह किस्म फसल को 110 दिन में तैयार कर देती है। इस किस्म से प्रति हेक्टेयर 300 क्विंटल तक आलू की पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

कुफरी सिंदूरी

आलू की यह किस्म फसल को 120 से 125 दिनों में तैयार कर देती है। इस किस्म से आलू की प्रति हेक्टेयर 300 से 400 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है।

कुफरी देवा

आलू की यह किस्म 120 से 125 दिनों में पककर तैयार हो जाती है। इससे प्रति हेक्टेयर 300 से 400 क्विंटल तक उत्पादन अर्जित किया जा सकता है।

आलू की संकर किस्में

ई 4486

यह किस्म 135 दिन में फसल को तैयार करती है। इससे प्रति हेक्टेयर 250 से 300 क्विंटल पैदावार मिल सकती है। इसको यूपी, हरियाणा, बिहार, पश्चिम बंगाल, गुजरात और मध्य प्रदेश के लिए अधिक उपयोगी माना गया है।

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इस किस्म के आलू की कीमत जानकर हैरान हो जाएंगे आप

कुफरी अलंकार

आलू की ये किस्म केंद्रीय आलू अनुसंधान शिमला द्वारा कई विकसित की गई है। इस किस्म से फसल 70 दिन में तैयार हो जाती है। इससे प्रति हैक्टेयर 200-250 क्विंटल तक पैदावार प्राप्त की जा सकती है। बता दें कि यह किस्म पछेती अंगमारी रोग के लिए कुछ हद तक प्रतिरोधी है।

कुफरी जवाहर जेएच 222

आलू की यह किस्म फसल को 90 से 110 दिन में तैयार कर देती है। यह किस्म अगेता झुलसा और फोम रोग के लिए प्रतिरोधी है। इससे प्रति हेक्टेयर 250 से 300 क्विंटल पैदावार प्राप्त हो सकती है।

आलू की नवीन किस्में

आलू की नई किस्मों में कुफरी चिप्सोना-2, कुफरी गिरिराज, कुफरी चिप्सोना-1 और कुफरी आनंद आदि अच्छी किस्में मानी गई हैं।

आलू का बीज किस तरह और कहाँ से उपलब्ध होगा

किसान आलू प्रौद्योगिकी केंद्र शामगढ़ जिला करनाल से आलू की तीन किस्मों का बीज खरीद सकते हैं। यहां से किसानों को आलू की कुफरी, पुखराज, कुफरी चिपसोना-1, कुफरी ख्याती का बीज मिल सकता है। टीशु कल्चर द्वारा आलू बीज उत्पादन किया जाता है। इस विधि द्वारा विषाणु रहित आलू का बीज उत्पादन किया जा सकता है। वार्षिक एक लाख सूक्ष्म पौधों का उत्पादन होता है। नेट हाउस में 5-6 लाख मिनी ट्यूबर की पैदावार होती है। सीपीआरआई शिमला एवं अंतर्राष्ट्रीय आलू केंद्र लीमा, पेरू के साथ नवीन किस्मों का परीक्षण किया जाता है।

वैज्ञानिक ढ़ंग से आलू की खेती में बुवाई की विधि

सबसे पहले ट्रैक्टर एवं कल्टीवेटर की मदद से खेत की बेहतर ढ़ंग से जुताई। साथ ही, पाटा लगाकर खेत को एकसार बना लें। इसके उपरांत आलू प्लांटनर की सहायता से आलू के बीजों की बुवाई करें। बतादें, कि यह आलू बोने की एक सटीक मशीन है, जिसे वैश्विक पार्टनर डेल्फ की सहायता से डिजाइन और तैयार किया गया है। इसका हाई लेवल सिंगुलेशन आलू के बीज को नुकसान नहीं होने देता है। यह एक स्थान पर एक ही बीज डालता है। इसके इस्तेमाल से आलू की गुणवत्तापूर्ण और शानदार पैदावार होती है।

आलू की सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई का उपयोग करें

आलू में हल्की सिंचाई की जरूरत होती है। इस वजह से किसानों को आलू की खेती में स्प्रिंकलर एवं ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल करना चाहिए। आलू की प्रथम सिंचाई ज्यादातर पौधे उग जाने के बाद करें। वहीं, दूसरी सिंचाई उसके 15 दिन पश्चात आलू बनने या फूलने की अवस्था में करनी चाहिए। कंदमूल बनने और फूलने के समय पानी की कमी का उत्पादन पर काफी बुरा असर पड़ता है। इन अवस्थाओं में सिंचाई 10 से 12 दिन के अंतराल पर करनी चाहिए। आलू की खेती के दौरान खेत में सिंचाई के दौरान इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि नालियों में मेढों की ऊंचाई के तीन चौथाई से ज्यादा ऊंचा पानी नहीं भरना चाहिए।

आलू की कटाई संबंधित जानकारी

आपकी जानकारी के लिए बतादें, कि भिन्न-भिन्न किस्मों के बीजों वाली फसल 70 से 135 दिन में पूरी तरह से पक जाती है। पकी हुई आलू की फसल की खुदाई उस वक्त करनी चाहिए, जब आलू के कंदों के छिलके कठोर हो जाऐं। किसानों के लिए आलू की खुदाई के लिए पोटैटो डिग्गर एक महत्वपूर्ण उपकरण होता है। किसान भाई इसकी मदद से आलू की खुदाई कम समय में काफी सुगमता से कर सकते हैं। इसके अतिरिक्त इसकी मदद से आलू बिना कोई कट लगे ये जमीन से बाहर आ जाता है। इतना ही नहीं यह भूमि से सहजता से आलू को बाहर तो करता ही है, साथ में लगी मिट्टी को भी झाड़ देता है। इस तरह बेहतरीन गुणवत्ता के आलू बाहर निकल आते हैं। एक सटीक गहराई निर्धारित करते हुए इस यंत्र को ट्रैक्टर के साथ उपयोग किया जा सकता है।

आलू की जैविक खेती और उपयोग होने वाले कृषि यंत्र

भारत में आलू की जैविक खेती भी की जाती है। जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग की वजह से किसानों की आलू की जैविक खेती में दिलचस्पी बढ़ रही है। सामान्य तौर पर किसान सही जानकारी के अभाव में आलू की जैविक खेती से अधिक उत्पादन प्राप्त नहीं कर पाते हैं। आलू की जैविक खेती में आलू की बिजाई और आलू में उर्वरक का खास ध्यान रखा जाए तो अधिक उत्पादन की संभावना है। आलू की खेती में कृषि यंत्र जैसे कि ट्रैक्टर, कल्टीवेटर, आलू प्लांटनर, पोटैटो डिग्गर यंत्र वहीं सिंचाई के लिए स्प्रिंकलर और ड्रिप सिंचाई यंत्र का उपयोग किया जाता है।
इस फसल की बढ़ती माँग से किसानों को होगा अच्छा मुनाफा

इस फसल की बढ़ती माँग से किसानों को होगा अच्छा मुनाफा

आपकी जानकारी के लिए बतादें कि एक हेक्टेयर में करीब 25 टन शकरकंद का उत्पादन होता होता है। यदि किसान इसकी कीमत 10 रुपए किलो के हिसाब से भी मानें तो एक एकड़ से उत्पादक न्यूनतम 1.25 लाख रुपए अर्जित कर सकते हैं। वर्तमान में विश्वभर में भारत से बहुत सारे उत्पाद व वस्तुएं निर्यात की जाती रही हैं, शकरकंद उनमें से एक है। आलू की भाँति दिखने वाला शकरकंद की भारत सहित विश्वभर में माँग की जाती है। दरअसल, विश्वभर में शकरकंद निर्यातकों की सूचि में भारत छठवें स्थान पर है, परंतु जिस प्रकार से किसान इसके उत्पादन पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। इस हिसाब से बहुत जल्द भारत चीन को पछाड़कर निर्यातकों की सूचि में प्रथम स्थान हासिल प्राप्त करलेगा। बतादें, कि देश के बहुत सारे राज्यों में शकरकंद का उत्पादन बेहतरीन तरीके से किया जा रहा है एवं किसान इसकी फसल से अच्छा खासा लाभ भी उठा पा रहे हैं। आगे हम इस लेख में शकरकंद के उत्पादन से कैसे अधिक मुनाफा कमा पाएंगे इस विषय में हम चर्चा करेंगे। शकरकंद का उत्पादन करने हेतु सर्वप्रथम उत्पादक द्वारा स्वयं की भूमि का मृदा परीक्षण करना होगा। यदि किसान के भूमि की मृदा अत्यंत कठोर एवं पथरीली है अथवा किसान के खेत में जलभराव जैसी दिक्कत भी है, ऐसे में कृषकों हेतु शकरकंद का उत्पादन करना अच्छा नहीं होगा। साथ ही, यदि आपके खेत की मृदा का पीएच मान 5.8 से 6.8 के मध्य है, तो आप शकरकंद का उत्पादन करना बेहद आसानी से कर सकते हैं। शकरकंद का उत्पादन करने के दौरान सिंचाई का अत्यधिक ध्यान केंद्रित करना अत्यंत आवश्यक है। यदि किसानों ने ग्रीष्म ऋतु में शकरकंद के पौधे लगाए हैं, उस समय रोपाई के तुरंत उपरांत सिंचाई नहीं करनी चाहिए। किसान भाई ध्यान रखें कि सिंचाई सप्ताह में केवल एक बार ही हो। यदि बरसात का मौसम है, तो किसान बिल्कुल भी शकरकंद में बिल्कुल पानी न लगाएं।

किसान खाद किस तरह से लगाएं

वर्तमान दौर में यदि आप किसी भी फसल का उत्पादन कर रहे हैं, याद रहे कि आपकी फसल का उत्पादन खेतों में दिए गए खाद की गुणवत्ता एवं मात्रा एक अहम भूमिका निभाती है। यदि कृषक शकरकंद का उत्पादन कर रहे हैं, तो किसानों को निज खेतों में नाइट्रोजन, फॉस्फोसर एवं पोटाश का समुचित मात्रा में उपयोग करना चाहिए। साथ ही, यदि आपकी जमीन अत्यधिक अम्लीय है, ऐसी स्थिति में कृषकों को मैग्निशियन सल्फेट, जिंकोसल्फेट एवं बोरोन का उपयोग करना होगा। ऐसे उर्वरकों को किसान कृषि वैज्ञानिक एवं कृषि विशेषज्ञों के दिशा निर्देशानुसार ही समुचित मात्रा में दें।


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कितनी होगी पैदावार

आज के समय में फसल उत्पादकों हेतु बेहतरीन फसल का चुनाव सर्वाधिक चुनौतीपूर्ण बात है। किसानों को जिस फसल से अत्यधिक लाभ हो सके एवं उनके द्वारा किये गए व्यय को निकालकर वह अच्छी आमंदनी भी अर्जित कर सकें। हालाँकि, शकरकंद की बात की जाए तो यह फसल काफी अच्छी आमंदनी करने में सहायक साबित होती है। उत्पादन की बात करें तो एक हेक्टेयर में तकरीबन 25 टन शकरकंद की पैदावार होती है। किसान कम से कम 10 रुपए किलो भी शकरकंद का मूल्य रखें उस गणित से एक एकड़ में उत्पादन कर किसान न्यूनतम 1.25 लाख रुपए का लाभ अर्जित कर सकते हैं।